पारिभाषिक शब्दावली

महान दार्शनिक सुकरात के अनुसार “ज्ञान प्राप्ति की ओर पहला कदम परिभाषा है।” दार्शनिक अरस्तू के कथनानुसार सुकरात को सार्वभौमिक परिभाषाओं और ज्ञात ज्ञान के आधार पर तर्कों द्वारा निष्कर्ष निकालने की शैली का श्रेय जाता है। भौतिक राशियों और परिभाषाओं में समानता देखी जा सकती है। हम गणित में अपरिभाषित पदों के आधार पर ही मानक परिभाषाओं की रचना करते हैं ताकि गणितीय पद्धति का निर्माण हो सके। परिभाषाओं में भौतिक राशियों के समान यथार्थता नहीं होती है परिभाषाओं के यथार्थ न होने का अर्थ है कि विषय-वस्तु, घटना या प्रक्रिया की एक से अधिक परिभाषाओं का होना। परन्तु हाँ, परिभाषाओं में भौतिक राशियों के समान मानकता, स्पष्टता और व्यापक अर्थ में विशेषताओं की निश्चितता जरूर होती है। क्योंकि हम पहले से परिभाषित विषय-वस्तु, घटना या प्रक्रिया के लिए एक नया शब्द नहीं गढ़ते हैं और न ही नयी विषय-वस्तु, घटना या प्रक्रिया के लिए पहले से प्रयुक्त परिभाषित शब्दों का प्रयोग करते हैं। इसलिए हम किसी अस्तित्व, घटना या कार्य को परिभाषित करते समय विशेष रूप से यह ध्यान में रखते हैं कि अनजाने में ही सही कोई अन्य अस्तित्व, घटना या कार्य परिभाषित नहीं होना चाहिए। और परिभाषा में न ही उस शब्द का प्रयोग करना चाहिए जिसे परिभाषित किया जा रहा है।

वैज्ञानिक शब्दावली
  • विज्ञान (Science) : प्रश्नों के उत्तर रूप में प्राप्त संयोग का विधियुक्त पद्धतीय ज्ञान जिसे प्रत्यक्ष परखा या दोहराया जा सकता है विज्ञान कहलाता है। विज्ञान = विधि + ज्ञान, जहाँ विधि को दोहराव के लिए जाना जाता है। तथा ज्ञान निष्कर्ष के रूप में स्वीकार्य होता है।
  • वैज्ञानिक विधियाँ (Scientific Methods) : ऐसी प्रक्रिया जिसे एकरूपता ढूँढ़ने या प्रदान करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है विधि कहलाती है। दार्शनिक चार्ल्स सैंडर्स पियर्स के अनुसार विधि को ऐसा होना चाहिए कि सभी मनुष्य अंत में एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे। इसलिए अंतिम उत्पाद के रूप जब ज्ञान में एकरूपता की प्राप्ति होती है। तब ऐसे निष्कर्षों को प्राप्त करने वाली प्रक्रिया को वैज्ञानिक विधियाँ कहते हैं। स्वाभाविक रूप से इनका दोहराव किया जा सकता है। इसलिए इनमें प्रमाण होने के गुण उपस्थित होते हैं।
  • वैज्ञानिक पद्धति (Scientific System/Scheme/Paradigm) : अभी तक मान्य, प्रासंगिक, अद्यतन और प्रामाणिक ज्ञान जो आपस में संगत होता है व्यवस्था का बोध कराता है। व्यवस्था का बोध कराने वाले प्रभावी सिद्धांतों, नियमों, तथ्यों और सहज बोध को पद्धति कहते हैं। तथ्यों का सहजबोध, स्वयं-सिद्ध अभिधारणाएँ और सैद्धांतिक व्याख्याएँ वैज्ञानिक पद्धति के तीन अंग हैं। या तो प्रत्येक वैज्ञानिक खोज इसी वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर निगमित की जाती है। या फिर वैज्ञानिक विधियों पर आधारित खोजों को इसी पद्धति के संगत होने पर स्वीकार किया जाता है। इस तरह से वैज्ञानिक पद्धति किसी विशेष समय के लिए अब तक मान्य, प्रासंगिक, अद्यतन और प्रामाणिक ज्ञान का संगत संकलन होता है। जो मानव जाति के विकास में सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की स्थापनाओं का एक पड़ाव मात्र है।
  • सहजबोध (Common Sense) : समान-असमान या सामान्य-असामान्य प्रत्यक्ष अवलोकनों पर आधारित वस्तुओं-पिंडों या घटनाओं के बारे में रंग, रूप, संरचना (आकृति-आकार), समूह, क्रम, सम्बन्ध आदि का बोध होना। सहजबोध कहलाता है। यह वैज्ञानिक पद्धति का पहला अंग है।
  • अभिधारणा (Postulate) : प्रत्यक्ष अवलोकनों और अनुभव पर आधारित ऐसी स्वयंसिद्धियाँ जो सत्य और उस तक पहुँचने के साधनों, तरीकों या मार्गों के बारे में किसी विशेष क्षेत्र या विश्व के व्यक्तियों की उस कालखंड की आमसमझ के रूप में मान्य होती हैं अभिधारणाएँ कहलाती हैं। यह वैज्ञानिक पद्धति का दूसरा अंग है। इन्हें प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है।
  • वैज्ञानिक व्याख्या (Scientific Explanation) : प्रत्यक्ष घटना और उसके सत्य को वैज्ञानिक सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों के सहयोग से समझाना या व्यवहार में पुनः घटित करने को वैज्ञानिक व्याख्या कहते हैं। इसे घटनाओं से उपजे प्रश्नों के उत्तर रूप में दी गयी किसी विशेष कालखंड की सबसे सटीक व्याख्या कहा जा सकता है। यह वैज्ञानिक पद्धति का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग है। ओकहम के दार्शनिक विलियम (William of Ockham) के अनुसार वैज्ञानिक व्याख्या के लिए ‘उस सिद्धांत (theory) को चुनते हैं जो न्यूनतम अज्ञात कारकों का उपयोग करता है।’
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Approach) : घटनाओं की व्याख्या करने या आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संभावनाओं को साकार रूप देने में सहयोगी पद्धति आधारित व्यापक तार्किक दृष्टिकोण को वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं। आँकड़ों और वैज्ञानिकों की आदर्श कार्यशैली के निष्कर्षों पर आधारित यह दृष्टिकोण ज्ञात से अज्ञात को जानने या उसे स्वीकार्य करने, घटनाओं की सटीक व्याख्या करने, भौतिक साधनों, तकनीकों और यंत्रों को विकसित करने तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम होता है।
  • वैज्ञानिक अभिवृत्ति (Scientific Attitude/Temper) : सभी के कल्याण और हित को ध्यान में रखते हुए सामाजिक उत्थान के लिए आवश्यक व्यक्ति विशेष की ऐसी मनोवृत्ति जो एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था की माँग और उसके अनुरूप वैज्ञानिक खोजों के प्रभाव में सामंजस्य बनाये रखने के लिए जरूरी होती है। वैज्ञानिक अभिवृत्ति कहलाती है। जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यकताओं के आधार पर सिर्फ माँग की पूर्ति करने का प्रयास करता है। वहीं वैज्ञानिक अभिवृत्ति विज्ञान और उसकी सामाजिकता जिसके अंतर्गत आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और न्यायिक सामाजिक स्वरूप कार्य करता है पर आधारित होती है। जिससे कि न केवल वैज्ञानिक खोजों और उसके प्रभाव के प्रति सजग और तैयार रहा जा सके बल्कि आवश्यकतानुसार एक बेहतर विकसित सामाजिक व्यवस्था की प्राप्ति के लिए उसमें परिवर्तन भी होता हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण में विज्ञान की सामाजिकता जुड़ जाने से वह एक विकसित रूप वैज्ञानिक अभिवृत्ति बन जाता है। आज विश्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के इसी विकसित स्वरूप अभिवृत्ति की आवश्यकता जान पड़ी है। वैज्ञानिक अभिवृत्ति से आशय है कि पक्षपात, पूर्वाग्रह, संकीर्णता एवं अन्धविश्वास से मुक्ति, वैकल्पिक युक्तियों, साधनों और व्यवस्थाओं पर भी विचार, अपने अधिकारों के प्रति सजगता और कर्तव्यों के प्रति निष्ठा, बौद्धिक ईमानदारी, जिज्ञासु प्रवृत्ति, क्षेत्र-काल में दूरदृष्टि के आधार पर निर्णय, नवाचारी, उदार व्यक्तित्व, आलोचनात्मक-मनोवृत्ति, यथार्थ को जानने का प्रयास, प्रमाण के अभाव में सत्य को स्वीकार्य न करना तथा दावा एवं निष्कर्षों को परखने की आवश्यकता को महसूस करना आदि।
  • रहस्य (Mystery) : जिसे अभी तक सुलझाया नहीं जा सका है। अर्थात जिस घटना के पीछे की प्रकृति वर्तमान में ज्ञात न हो। अज्ञात रहने तक ही रहस्य हमें अलौकिक या चमत्कार मालूम होता है। क्योंकि ज्ञात हो जाने पर हम भी इसका दोहराव कर सकते हैं।
  • चित्राम (Pattern) : घटनाओं के निश्चित क्रम, आवर्तकाल, परिवर्तन के प्रभाव और भौतिक मान के शाश्वत तथा कार्य-कारण सम्बन्ध, सह-सम्बन्ध, संभावनाओं, स्वरूप और रंग के सार्वभौमिक होने को चित्राम कहते हैं। जहाँ प्रतिमान शाश्वत तथा प्रतिरूप सार्वभौमिक होते हैं। गणित और विज्ञान में मूल रूप से हम इन्हीं चित्रामों (प्रतिमान या प्रतिरूप) की एकरूपता या निश्चितता को खोजते हैं।
  • खोज (Discovery) : खोज उस प्रक्रिया या कार्य को कहते हैं, जिसके सहयोग से हम इस दुनिया में पहले से मौजूद भौतिकता के किसी भी रूप की जानकारी अथवा अवस्थित स्थान का पता लगाते हैं। अर्थात खोजकर्ता वह पहला व्यक्ति होता है, जो व्यक्तिगत रूप से उस खोजे गये भौतिकता के रूप अथवा स्थान का दुनिया के साथ सर्वप्रथम परिचय कराता है। इसलिए हममें से ही कुछ लोग गुमी या भूली चीजों को ढूँढ़ने के लिए भी खोजना शब्द का प्रयोग करते हैं। खोजकर्ता समाज के सामने अपनी सूझबूझ के आधार पर खोजी गयी भौतिकता या स्थान की जानकारी रखता है। जरूरी नहीं है कि जिस जानकारी के साथ खोजकर्ता हमारा परिचय उस खोजी गयी भौतिकता के साथ करा रहा है। वह सच साबित हो! कहने का सीधा-सा अर्थ है कि इस जीवाश्म की खोज मैंने की है और उस जीवाश्म की खोज आपने की है। ‘खोजना, एक सामान्य क्रिया है। परन्तु जब हम किसी विधि के सहयोग से, किसी विशेष उद्देश्य से या फिर किसी ज्ञात ज्ञान की समझ से अज्ञात को खोजते हैं। तो उसे विज्ञान कहते हैं।’ और जिस विधि या प्रक्रिया के सहयोग से अज्ञात को खोजते हैं उन्हें वैज्ञानिक विधि या प्रक्रिया कहते हैं।
  • अवलोकन (Observation) : अवलोकन उस प्रक्रिया या कार्य को कहते हैं, जिसके सहयोग से हम खोजी गयी वस्तु अथवा स्थान के बारे में एक निश्चित क्रम में जानकारी एकत्रित करते हैं। अवलोकन एक नजर में खोजी गयी भौतिकता के रंग-रूप, आकार और संरचना की जानकारी देता है। एक निश्चित क्रम में जानकारी एकत्रित करने का मूल उद्देश्य सिर्फ इतना-सा होता है कि उस विषय-वस्तु अथवा स्थान का कोई भी पहलु हमारी जानकारी से अछूता न रह जाए। अवलोकन भी एक सामान्य क्रिया है। जिसका उपयोग प्रेक्षण, प्रयोग और परीक्षण तीनों वैज्ञानिक विधियों में किया जाता है। प्रत्यक्ष अनुभवों से एकत्रित सूचनाओं के आधार पर घटनाओं को जानने-समझने की प्रक्रिया प्रेक्षण विधि कहलाती है।
  • वर्गीकरण (Classification) : इस प्रक्रिया के तहत हम अवलोकन से प्राप्त जानकारी के आधार पर उस खोजी गयी विषय-वस्तु को एक वर्ग (समूह), श्रेणी या स्तर और स्थान को स्थिति प्रदान करते हैं। ताकि उस विषय-वस्तु अथवा स्थान की पुनः पहचान आसानी से की जा सके। इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य उस विषय-वस्तु अथवा स्थान के वस्तुनिष्ठ ज्ञान को चिन्हित करना होता है। ताकि उसी खोज के लिए दोबारा कोई अन्य व्यक्ति आसानी से दावा पेश न कर सके।
  • एकीकरण (Unification) : दो भिन्न प्रकृति को सूत्रबद्ध कर देना एकीकरण कहलाता है। एकीकरण उन दो भिन्न प्रकृति में सैद्धांतिक एकरूपता होने पर ही संभव होता है। एकीकरण के अनुसार यदि दो भिन्न प्रकृति एक-दूसरे को प्रभावित या आपस में परिवर्तित हो सकती हैं का यह अर्थ कदापि नहीं होता है कि हम आगमन विधि के स्थान पर निगमन, ऊर्जा के स्थान पर पदार्थ या विद्युत के स्थान पर चुम्बक का उपयोग कर सकते हैं।
  • विश्लेषण (Analysis) : इस प्रक्रिया के तहत हम वर्गीकृत भौतिकता के रूपों को कुछ निश्चित बिन्दुओं के आधार पर परिभाषित (विश्लेषित) करते हैं। क्योंकि ये गुणात्मक बिंदु उस समूह की विशेषता, गुण या उसके अपने लक्षण होते हैं। फलस्वरूप ये निश्चित बिंदु एक ही समूह में स्थित अनेक भौतिकता के रूपों में भेद करने में सहयोगी सिद्ध होते हैं। ऐसा करने से हमारे पास उस खोजी गयी भौतिकता अथवा स्थान की जानकारी और अधिक विस्तृत हो जाती है। क्योंकि इस प्रक्रिया के तहत हम पूर्व में खोजी गयी संबंधित भौतिकता का सम्बन्ध वर्तमान में खोजी गयी भौतिकता के साथ ज्ञात करते हैं। इसी प्रक्रिया का एक दूसरा पहलु आकलन (Estimate) हमारी जानकारी को और अधिक विस्तार देता है। इसके तहत हम खोजी गयी भौतिकता अथवा स्थान के बारे में अनुमान बैठाते हैं। जरूरी नहीं है कि वह अनुमान सही साबित हो। यह अनुमान खोजी गयी विषय-वस्तु की प्रकृति, उसके व्यवहार और भौतिकीय मान (राशियों) को लेकर के बैठाले जाते हैं। आकलन के द्वारा मापन की प्रक्रिया की नींव रखी जाती है। मापन का सैद्धांतिक पक्ष इसी क्रिया (आकलन) पर आधारित होता है।
  • पद्धति (System/Scheme/Paradigm) : जिस किसी ज्ञात ज्ञान के संगत हम उसी पर आधारित नये सिद्धांतों और नियमों का प्रतिपादन और तथ्यों की खोज करते या स्वीकार करते हैं को हम पद्धति कहते हैं। पद्धति निर्मित करने में उस ज्ञात ज्ञान का उपयोग किया जाता है जो अब तक प्रमाणित, विश्वसनीय और घटनाओं की सटीक व्याख्या करता है। जिसमें अनुभव और मान्यताएँ भी शामिल होती हैं। पद्धति से प्राप्त नये सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों से यह अपेक्षा रखी जाती है कि इससे मानव जाति का विकास ही होगा। उदाहरण के लिए जीवन पद्धति, चिकित्सा पद्धति, शिक्षा पद्धति, दशमलव पद्धति, वैज्ञानिक पद्धति और गणितीय पद्धति आदि
  • प्रक्रिया (Process) : क्रिया या कार्य की ऐसी क्रमबद्ध शृंखला जो किसी निर्णायक अंत में जाकर रूकती है। प्रक्रिया कहलाती है। क्रिया या कार्य के निश्चित क्रम या नियमबद्ध होने से प्रक्रिया की सफलता सुनिश्चित हो जाती है।
  • विधि (Method) : ऐसे तरीके या उपाय जो कभी असफल और अप्रभावी नहीं होते हैं विधि कहलाते हैं। जिन विधियों से तथ्य निगमित किये जाते हैं अर्थात ज्ञान में वृद्धि होती है उन्हें हम वैज्ञानिक विधियाँ कहते हैं। विधियाँ कार्य-कारण सम्बन्ध पर आधारित होती हैं। ज्ञान प्राप्ति के अलावा तकनीक विकसित करने और सामाजिक एकरूपता के पीछे यही विधियाँ कार्यरत होती हैं। स्वाभाविक रूप से सफलता सुनिश्चित होने की वजह से इनका दोहराव किया जाता है। ताकि वैज्ञानिक विधियों द्वारा तथ्य जैसे अभौतिक उद्देश्य के सत्य होने की पुष्टि हो सके।
  • प्रमाण (Proof) : सत्य के प्रति समझ विकसित करने के लिए जिस ठोस की आवश्यकता होती है वह प्रमाण कहलाता है। विज्ञान में विधि, भविष्यवाणी और उपयोगिता को प्रमाण माना जाता है। जिनको भविष्य में भी परखा जा सकता है। इसलिए यह अन्य प्रमाणों से अधिक विश्वसनीय होते हैं।
  • भविष्यवाणी (Prediction) : ऐसे कथन या दावे जिनका सत्यापित होना भविष्य में सिद्ध होता है कि वह सही थे या गलत थे। ऐसे कथन या दावे भविष्यवाणी कहलाते हैं। ये कथन दो प्रकार के होते हैं।
  • पूर्वाकलन (Estimation) : सैद्धांतिक ज्ञान के आधार पर आँकड़ों पर निर्भर घटना की गणितीय भविष्यवाणी पूर्वाकलन कहलाती है।
  • पूर्वानुमान (Forecast) : सिद्धांतों और नियमों पर आधारित किसी अज्ञात अस्तित्व और उसको पहचानने में सहायक गुणों की भविष्यवाणी पूर्वानुमान कहलाती है।
  • परिकल्पना (Hypothesis) : जब दो तथ्य प्रायोगिक रूप से प्रमाणित होते हैं परन्तु उनका आपसी कोई सम्बन्ध ज्ञात नहीं होता है तब हम परिकल्पना करते हैं। परिकल्पना सदैव उन तथ्यों के आपसी सम्बन्ध के बारे में एक सुझाव होता है। जो बाद में प्रयोग द्वारा सत्य-असत्य घोषित होती है। इस प्रकार एक वैज्ञानिक परिकल्पना इसी दुनिया का विवरण प्रस्तुत करती है न कि किसी अन्य दुनिया के बारे में कहती या सम्भावना जताती है। परिकल्पना इस अर्थ से कल्पना से भिन्न होती है कि उसे परखा जा सकता है। सत्य होने के बाद उसे समाज में सिद्धांत या नियम के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है।
  • सिद्धांत (Theory/Principle) : वह ज्ञान जो प्रत्यक्ष अवलोकनों, घटनाओं, मानवीय कार्यों और तथ्यों को सार्थक अर्थ देता है सिद्धांत कहलाता है। वैज्ञानिक सिद्धांतों की यह विशेषता है कि वे नयी-नयी परिस्थितियों की व्याख्या करने में भी सक्षम होते हैं।
  • नियम (Law/Rule) : ऐसी प्रक्रियाएँ जो किसी व्यवस्था या तंत्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक या उसके सुचारू रूप से चलायमान होने के लिए उत्तरदायी होती हैं। उन प्रक्रियाओं को नियम कहते हैं। व्यवस्था या तंत्र के संचालन में नियम एक महत्त्वपूर्ण तत्व है।
  • तथ्य (Fact) : वह सत्य जिसका पूर्वानुमान या पूर्वाकलन प्रत्यक्ष-व्यावहारिक पुष्टि होने से पहले सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है। तथ्य कहलाता है। इस तरह से सिद्धांतों के आधार पर तथ्य सत्यापित होते हैं तथा तथ्यों की प्रत्यक्ष-व्यावहारिक पुष्टि होने से सिद्धांत प्रमाणित कहलाते हैं। तथ्य सदैव सह-सम्बन्ध, प्रायोगिक परिणाम, सूत्र, समीकरण या रंग-रूप के बारे में होते है।
  • प्रयोग (Experiment) : जिन कार्यों के पूर्ण होने तक सफलता-असफलता के विषय में संशय बना रहता है ऐसे कार्यों को हम प्रयोग कहते हैं। अनुमानित प्रकृति, उसके व्यवहार और भौतिकीय मान को सिद्ध करने के लिए जिस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। विज्ञान में उसे प्रयोग कहते हैं। याद रहे प्रयोग की पूरी रूपरेखा पहले से ही परिकल्पना के रूप में बना ली जाती है। प्रयोग के दौरान सिर्फ इस बिंदु को ध्यान में रखा जाता है कि परिकल्पना सम्बंधित शर्तों को ध्यान में रखकर सावधानी पूर्वक प्रत्येक बिंदु का क्रमवार उपयोग किया जा रहा है या नहीं। प्रयोग के दौरान होने वाली संभावित त्रुटियों को अलग से ध्यान में रखा जाता है। तत्पश्चात प्रायोगिक परिणाम की तुलना अनुमानित परिणाम से की जाती है।
  • परिणाम (Result) : बारीकी और व्यवस्थित तरीके से किये गये कार्यों के उद्देश्य प्राप्ति का प्रदर्शन परिणाम कहलाता है।
  • निष्कर्ष (Conclusion) : परिणाम आ जाने के उपरांत प्रयोग करने की सार्थकता की समीक्षा को निष्कर्ष कहते हैं।
  • नियतांक (Constant) : वह संख्यात्मक या मात्रात्मक मान जो दो या दो से अधिक घटकों के बीच के सह-सम्बन्ध को व्यक्त करता है तथा प्रणाली के अस्तित्व के लिए आवश्यक होता है। वह गणितीय मान नियतांक कहलाता है। इसी सह-सम्बन्ध को कारण-प्रभाव का सम्बन्ध समझ लेने से प्रणाली में व्यवस्था का बोध होता है।
  • क्रांतिक मान (Critical Value) : परिवर्तन की वह सीमा जिसके बाद प्रभाव की प्रकृति बदल जाती है परिवर्तन की उस सीमा का मात्रात्मक मान क्रांतिक मान कहलाता है। इस मान से व्यवस्था में हस्तक्षेप या परिवर्तन कर सकने की सीमा का पता चलता है।
  • मापन (Measurement) : कहने को तो हम भौतिकीय राशियों का मापन यांत्रिकी साधनों द्वारा ज्ञात करते हैं। परन्तु इसको ज्ञात करने की जरूरत हमें इस स्थिति में जान पड़ती है। जब हम प्रायोगिक परिणाम की तुलना अनुमानित परिणाम से करते हैं। दोनों परिणामों के मध्य का एक छोटा-सा भी अंतर हमें भौतिकीय राशियों के रूप में स्वयं को परिभाषित करने को बाध्य करता है। अर्थात दोनों परिणामों के मेल न होने पर हम उस असमानता को भौतिकीय राशियों की मदद से माप सकते हैं। और यहाँ मजेदार तथ्य यह है कि इन भौतिकीय राशियों की माप का तरीका और मापन के यंत्रों की प्रक्रिया दोनों हमें इसी स्थिति में जाकर के ज्ञात हो जाती हैं। याने कि ‘जहाँ शंका है वहीं निदान है।’ वैश्वीकरण से मापन की प्रणालियों को मानकता प्रदान हुई है। वर्तमान में हम ब्रह्मांडीय स्थिरांकों को आधार बनाकर मापन की प्रणालियाँ विकसित करने में लगे हुए हैं।
  • गणना (Count/Calculate/Tally) : इस प्रक्रिया का उपयोग परिवर्तन की दर, भौतिकता की प्रकृति, नए गुणों की उत्पत्ति और उनकी सीमाओं को निर्धारित करने में होता है। जब किसी भी प्रयोग को सावधानी पूर्वक करने के बाद भी यदि उस प्रयोग के किसी एक गुण में लयबद्ध परिवर्तन देखने को मिलता है। तब हम उस प्रयोग की गणना के आधार पर परिवर्तन की दर अथवा भौतिकता की प्रकृति को निर्धारित करते हैं। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनों की गणना (संख्या) परमाणुओं के गुणों की जानकारी देती है।
  • प्रतिपादन (Rending) : इस प्रक्रिया के तहत हम भौतिकीय तंत्र (Physical System) और उसके प्रकार्य (Function) को भलीभांति समझने का प्रयास करते हैं। इसके लिए हम उस तंत्र को परिभाषित करने में सक्षम सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हैं। ताकि इन सिद्धांतों के उपयोग से हम उस भौतिकीय तंत्र (Physical System) की नियति और उस तंत्र के महत्त्व को समझ सकें। जिसका एक हिस्सा हमें खोज के दौरान प्राप्त हुआ है। अर्थात इस प्रक्रिया के दौरान हम सिद्धांतों और नियमों का प्रतिपादन करते हैं।
  • अध्ययन (Study) : इस प्रक्रिया के दौरान हम भौतिकीय तंत्र के प्रकार्य को भलीभांति संचालित करने वाले कारणों और नियमों को जानने की कोशिश करते हैं। जो उस तंत्र के अपने नियतांक (भौतिक राशियों के रूप में) कहलाते हैं। अध्ययन के अंतर्गत परिसीमन का कार्य किया जाता है। जिसके लिए हम आँकड़े एकत्रित करते हैं। फलस्वरूप हम एक निष्कर्ष तक पहुँच पाते हैं। उदाहरण के लिए 1.4 सौर द्रव्यमान को चंद्रशेखर सीमा कहते हैं। भौतिकता के उसी रूप में बने रहने अथवा प्रकृति और गुण परिवर्तन की सीमा को जानने के लिए परिसीमन का कार्य किया जाता है। इस प्रक्रिया के तहत ही हमें उस तंत्र की व्यापकता और उस तंत्र या भौतिकता के अस्तित्व का औचित्य ज्ञात होता है।
  • अनुसंधान (Research) : अनुसंधान का अर्थ खोज करना ही है। परन्तु यह खोज प्रायः उन खोजे जा चुके भौतिकता के गुणों या तथ्यों की खोज है। जिसे अभी तक दुनिया के सामने नहीं लाया गया है। अनुसंधान को तकनीकी प्रक्रिया के अंतर्गत इसीलिए रखा जाता है। क्योंकि ये वही गुण होते हैं जिसकी अज्ञानता के चलते हम अपनी तकनीकी क्षमताओं को कम आंकने लगते हैं। हम संगत परिस्थितियों को असंगत मानने लगते हैं। इन गुणों को हम अक्सर खोजे जा चुके भौतिकता के रूपों में ही ढूँढ़ते हैं। यह कार्य एक तरह से अँधेरे में तीर चलने जैसा होता है। परन्तु इस कार्य के पूर्व में लगभग-लगभग इतना तय हो जाता है कि हम जिन गुणों की खोज कर रहे हैं। यदि वे निर्देशित दिशा में पाये जाते हैं तो वे कितने प्रभावी और उपयोगी सिद्ध होंगे! शाब्दिक अर्थ है कि किसी भी विषय पर क्रमबद्ध तरीके और सम्यक रूप से विचार करने को अनुसन्धान कहते हैं।
  • आविष्कार (Invention) : विज्ञान, गणित और कला के ज्ञात ज्ञान पर आधारित मानव जाति की वह कल्पना जिसे वह साकार रूप देता है। उसे आविष्कार कहते हैं। अधिकतर आविष्कार भौतिक होते हैं। इस प्रक्रिया में मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपने आसपास के साधनों और संसाधनों की क्षमताओं का उपयोग अपने हित को सँवारने के प्रयास हेतु करता है। जरूरी नहीं है कि मानव अपने पहले प्रयास में ही सफल हो जाए। जबकि वह यह पहले से जानता है कि वह इन्हीं साधनों के उपयोग से अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है। आविष्कार के सफल न होने का कारण मानव की उस प्रणाली को न समझ पाने की कमी है। जो वास्तव में उस आविष्कार को चलायमान बनाने के लिए आवश्यक होती है।
  • परीक्षण (Testing) : आविष्कार के सफल होने का ज्ञान हमें परीक्षण के दौरान ही ज्ञात होता है। बिना परीक्षण के किसी भी आविष्कार को सफल या असफल नहीं कहा जा सकता। परीक्षण सिर्फ यह जांचने के लिए किया जाता है कि आविष्कार चलायमान है अथवा नहीं है?
  • निरीक्षण (Inspection) : जांच-पड़ताल इस बात के लिए की जाती है कि आविष्कार यदि सफल पाया गया है तो आविष्कार हमारी अनुमानित आवश्यकताओं की पूर्ति में कितना खरा उतरता है? और यदि आविष्कार असफल पाया गया है तो इसके पीछे के क्या-क्या कारण हो सकते हैं? याद रहे निरीक्षण हमेशा नियमानुसार किया जाता हैं। निरीक्षण के अपने नियम या तरीके होते हैं। ताकि वास्तविकता की पहचान आसानी से हो।
  • अन्वेषण (Exploration) : अपरिचित क्षेत्र, धरातल या स्तर की यात्रा के दौरान जब हम क्रमवार तरीके से उस क्षेत्र, धरातल या स्तर की जानकारी किसी युक्ति या उपकरणों के माध्यम से एकत्रित करते हैं। तो इस प्रक्रिया को अन्वेषण कहते हैं। अन्वेषण को तकनीकी प्रक्रिया के साथ जोड़ने का मकसद सिर्फ इतना-सा है कि इस प्रक्रिया में तकनीकी ज्ञान का होना आवश्यक होता है।
  • तकनीक (Technique) : समस्या के व्यावहारिक समाधान की युक्ति को तकनीक कहते हैं। तकनीक उद्योगों को जन्म देती है।
  • आगमन (Inductive) : विशेष दृष्टान्तों (उदाहरणों और तथ्यों) से सामान्य नियमों को विधिपूर्वक प्राप्त करने की क्रिया को आगमन कहते हैं। इस विधि में निष्कर्ष क्षेत्र—काल की व्यापकता पर निर्भर करते हैं। इसलिए इस विधि में समय घटक के रूप में कार्यरत होता है। अर्थात आँकड़े और जानकारियाँ एकत्रित होने में समय लगता है। जो कि एक ही समय में विभिन्न स्थानों या लम्बी समयावधि में एक ही स्थान से एकत्रित किये जाते हैं। फलस्वरूप आगमन विधि का अनुमानित परिणाम समय, स्थान और घटक विशेष पर निर्भर करता है। व्यापक आँकड़े होने से परिणाम के सटीक होने की सम्भावना बढ़ जाती है। ज्ञात से अज्ञात, विशिष्ट से सामान्य, स्थूल से सूक्ष्म तथा मूर्त से अमूर्त की ओर प्रवृत्त होना आगमन की विशेषता है। उदाहरण के लिए चार चिड़ियों की आवाज सुनकर पाँचवी चिड़िया की आवाज को बिना सुने अनुमान लगा लेना कि वह भी बांकी चिड़ियों के समान चिंह-चिन्हाती है। इस तरह से इस विधि के अंतर्गत एकत्रित जानकारियों से पृथक अप्रत्याशित और नये निष्कर्ष निकलना असंभव होता है। परन्तु ध्यान रहे क्षेत्र—काल की व्यापकता पर निर्भर नयी जानकारियों और आँकड़ों से अप्रत्याशित और नये निष्कर्ष ही प्राप्त होते हैं।
  • निगमन (Deductive) : किसी घटना या तंत्र की व्याख्या के लिए प्रतिपादित सिद्धांत जब भविष्यवाणियाँ करने में सक्षम हो जाते हैं तब उस सिद्धांत के संगत तथ्यों की प्राप्ति को निगमन और उस प्रक्रिया को निगमन विधि कहते हैं। इन अप्रत्याशित दावों की भविष्यवाणियों को व्यावहारिक विधियों प्रेक्षण, प्रयोग या परीक्षण द्वारा सत्य या असत्य सिद्ध किया जा सकता है। भविष्यवाणी सत्य हो जाने से सिद्धांत प्रमाणित हो जाते हैं। सिद्धांत से तथ्यों, सामान्य से विशिष्ट, सूक्ष्म से स्थूल तथा अमूर्त से मूर्त की ओर प्रवृत्त होना निगमन की विशेषता है। उदाहरण के लिए जड़त्व के नियम से यह अनुमान लगाना कि गत्यावस्था और विरामावस्था पदार्थ की दो पूरक अवस्थाएँ हैं। जरूरी नहीं है कि ये निगमित निष्कर्ष वास्तविक दुनिया के सत्य ही हों। इस विधि में दार्शनिकता अधिक होने से एक काल्पनिक दुनिया की रचना संभव है। इस काल्पनिक दुनिया को व्यावहारिक विधियों द्वारा सत्य या असत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता है।
  • व्यक्तिनिष्ठ या व्यक्तिपरक (Subjective) : व्यक्तिगत अनुभव, भावना, आवश्यकता, समझ, लाभ, राय या मनोदशा पर आधारित परिणाम या इन सब से प्रभावित निष्कर्ष व्यक्तिपरक कहलाते हैं।
  • वस्तुनिष्ठ या वस्तुपरक (Objective) : व्यक्तिगत अनुभव, भावना, आवश्यकता, समझ, लाभ, राय या मनोदशा से अप्रभावित निष्कर्ष या इनसे ऊपर उठकर सिद्धांतों पर आधारित उभयनिष्ठ परिणाम वस्तुपरक कहलाते हैं।

गणितीय शब्दावली
  • अपरिभाषित पद : जिन चीजों को इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष देखकर-दिखाकर, चखकर, सूंघकर, छूकर या सुनकर जाना-समझा या समझाया जाता है क्योंकि उनको शब्दों द्वारा पूर्णतः परिभाषित करना असंभव होता है। उन्हें अपरिभाषित पद कहते हैं। उदाहरण : बिंदु, रेखा, रंग, स्वाद, गंध, ताप, ध्वनि, मनुष्य, पेड़, क्रियाएँ, समय आदि। अपरिभाषित पदों के अंतर्गत मूलतः अमूर्त चीजें आती हैं।
  • प्रमेय (Theorem) : अकाट्य और सुसंगत गणितीय कथनों को प्रमेय कहते हैं। इन गणितीय सत्यों को विचाराधीन रचनाक्रम के सन्दर्भ में स्वयंसिद्धों (Axioms) के आधार पर पूरे रचनाक्रम के लिए सही सिद्ध किया जा सकता है। इसे साध्य भी कहते हैं। इससे निश्चितता का बोध होता है।
  • उपपत्ति (Proof) : पूर्वस्थापित अभिगृहीतों (Axioms), परिभाषाओं और प्रमेयों से पुष्ट अकाट्य प्रमाणों एवं सुसंगत तथ्यों के आधार पर प्रमेय या गणितीय कथन को सिद्ध करना गणित में उपपत्ति कहलाता है। इस तरह से उपपत्ति तार्किक कथनों की शृंखला होती है जिसमें स्वयं-सिद्धियाँ, परिभाषाएँ और खोजे गये प्रमेय या सूत्र गुथे होते हैं। जिसका अंतिम निष्कर्ष एक प्रमेय, गणितीय कथन या सूत्र होता है।
  • अमूर्तिकरण : गणितीय निदान के लिए जब हम व्यावहारिक समस्या के केंद्रीय प्रश्न को अनावश्यक विस्तार से पृथक करते हैं तो इस प्रक्रिया को अमूर्तीकरण कहा जाता है।
  • निदर्श (Model) : उद्देश्य प्राप्ति के लिए किसी भी अस्तित्व या घटना के सिर्फ आवश्यक घटकों का निरूपण निदर्श कहलाता है।
  • सूत्र (Formula) : शाश्वत सत्य जिसके द्वारा घटना, क्रिया, तंत्र, रूप या वस्तु में सामंजस्य का बोध होता है। सूत्र कहलाता है।
  • समीकरण (Equation) : किसी घटना, क्रिया या तंत्र की वर्तमान या विशेष स्थिति के गणितीय निरूपण को समीकरण कहते हैं।
  • सामान्यीकरण (Generalization) : जब मनुष्य पहले से ज्ञात ज्ञान से तुलना करते हुए सामान्य-असामान्य या समानता-असमानता के आधार पर घटना, क्रिया, गुण, वस्तु आदि में कोई चित्राम (Pattern) खोजता है। तो उन चित्रामों में निहित सामान्य तथ्यों की खोज को सामान्यीकरण कहते हैं।

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