भारत में स्वतंत्रता से पहले और बाद में विज्ञान की स्थिति


“स्वदेशो देशान्तरमिति नेयं गणना विदग्धपुरुषस्य” प्रसिद्ध संस्कृत साहित्यकार दण्डी के कथन का अर्थ है कि विद्वान पुरुष के लिए स्वदेश और परदेश में कोई भेद नहीं होता है। जब विद्वान ही ऐसा कोई भेद नहीं रखते-करते हैं तो समीक्षक यह भेद कैसे खोज सकता है। क्षेत्रीयता या राष्ट्रीयता बनाम वैश्वीकरण के मुद्दे का अपना एक वैज्ञानिक पहलू भी है। विज्ञान के वस्तुनिष्ठ होने की वजह से वैश्वीकरण का पलड़ा भारी मालूम होता है। जबकि इसके बावजूद विज्ञान की प्रगति में पद्धति (paradigm) के विशेष योगदान की वजह से क्षेत्रीयता या राष्ट्रीयता का महत्त्व बढ़ जाता है। लगभग सौ वर्ष पहले तक संचार और आवागमन के साधनों में प्रगति न होने या उनके अभाव में वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रभाव क्षेत्रीय या राष्ट्रीय बना रहा है परन्तु अब सभी वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रभाव वैश्विक हो गया है। जबकि विद्वानों या वैज्ञानिकों की उपलब्धियाँ किसी क्षेत्र विशेष या विश्व की व्यापकता को ध्यान में रखने से अर्जित नहीं होती हैं और न ही वे अपनी उपलब्धियों के प्रभाव को सीमित या नियंत्रित करते हैं।

विज्ञान का प्रभाव भविष्य में तकनीक के आविष्कार के रूप में परिलक्षित होता है। हम विज्ञान के सहयोग से अपने भविष्य की दिशा और दशा बदल सकते हैं परन्तु पराधीन भारत के बारे में तब अंग्रेजों ने बोलना शुरू किया कि भारतीय लोगों में स्वशासन करने की क्षमता नहीं है। भारतीय सभ्यता की कोई उपलब्धियाँ नहीं हैं। ताकि भारतीयों में हीन भावना का जन्म हो और वे स्वयं पर विश्वास करना छोड़ दें, जिससे हमारा भविष्य अंधकारमय हो जाता। तब अंग्रेजों ने हड़प्पा सभ्यता के ऐतिहासिक प्रमाणों को भी दबाये रखा था परन्तु अंग्रेजों की इस सोच को तब स्वतंत्रता सेनानी सहित पूरा विश्व देख रहा था और भलीभांति समझ रहा था। प्रतिक्रिया स्वरूप स्वतंत्रता सेनानियों ने भारतीय समाज के बीच सभ्यता की प्राचीन उपलब्धियाँ गिनानी शुरू कीं, जिससे कि हम भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का जन्म हुआ।

हम भारतीय दो सौ वर्ष पहले भी अनुसरणकर्ता थे और आज भी अनुयायी बने रहना चाहते हैं। हमने स्वयं पर विश्वास करना नहीं सीखा है क्योंकि विज्ञान और उसकी प्रक्रिया को हम जानते नहीं हैं, हमने उसको उपयोग में लेना नहीं सीखा है। हम भारतीय एक समय तक जो कुछ वैज्ञानिक कार्यशैली के बारे में जानते थे उसे हमने लगभग भुला दिया है। हमने पूर्वजों की उपलब्धियों को गिनाना और उसे पूजना तो सीख लिया है परन्तु उनको पढ़ना, सहेजना या आत्मसात करना नहीं सीखा है। जब हम अपना वर्तमान नहीं संवारेंगे तो हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य कैसे सुरक्षित रह सकता है? आप क्या चाहते हैं कि अगली पीढ़ी भी हमारी तरह सिर्फ उपलब्धियाँ गिनाती रह जाए? हाँ, यह सच है कि राष्ट्रीयता की भावना थोड़ी अनिश्चितता में ही संकीर्ण विचार में बदल जाती है और तब उस भावना का राजनीति द्वारा दुरुपयोग करना भी संभव है। इसके बावजूद राष्ट्रीयता या क्षेत्रीयता के बने रहने से मनुष्य को स्वतंत्रता का बोध होता है। स्वयं निर्णय लेने और उसके प्रभाव को स्वीकार करने से आत्मविश्वास मजबूत होता है। सत्य के अन्य पक्ष भी मानव जाति के संज्ञान में आते हैं। तब समग्र विकास की सभी संभावनाएँ बनी रहती हैं। अन्यथा वैश्वीकरण की व्यवस्था में विकल्पों का लोप हो जाता है। तब सत्य होने से जीत सुनिश्चित नहीं होती है बल्कि जीत, सत्य को निर्धारित करती है। इसी कारण खगोलविद न्यूटन से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में रसायनज्ञ आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय तक विश्व की सभी क्रांतियों को वैज्ञानिकों का प्रत्यक्ष योगदान प्राप्त होता रहा है।

मैं रसायन शाला का प्राणी हूँ मगर ऐसे भी मौके आते हैं जब समय की माँग होती है कि टेस्ट-ट्यूब छोड़कर देश की पुकार सुनी जाये। ― रसायनज्ञ आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय (भाषण से)

नीचे दिया गया पहला और दूसरा गद्यांश स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले, सन 1939 में प्रकाशित पुस्तक से लिया गया है। जबकि तीसरा गद्यांश सन 2001 में प्रकाशित पुस्तक से लिया गया है। दोनों पुस्तकों के गद्यांश शब्दशः साभार लिये गये हैं। इन तीनों गद्यांश को पढ़कर अब आपको स्वयं तय करना और समझना है कि हमने पिछले सत्तर वर्षों में हमारे पूर्वजों की उपलब्धियों को सिर्फ गिनाकर या उन्हें पूजकर विज्ञान क्षेत्र में क्या हासिल कर लिया है और हमारी अगली पीढ़ी को हम क्या सौंपने जा रहे हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर लिखने वाले विज्ञान-इतिहासकार भौतिकविद जॉन डेस्मंड बर्नल ने 1939 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द सोशल फंक्शन ऑफ़ साइंस’ में लिखा है - भारत में विज्ञान असरदार तरीके से बीसवीं सदी में ही शुरू हुआ। हम निश्चय के साथ यह कह सकते हैं कि भारत में वैज्ञानिक विकास की महान संभावनाएँ छिपी हुई हैं; रामानुजन के गणित ने और बोस तथा रमन की भौतिकी ने यह पहले ही दिखा दिया है कि भारतीय वैज्ञानिक सबसे अगली कतारों तक पहुँचने के लायक हैं। फिर भी, जिन मुश्किलों का सामना भारतीय विज्ञान कर रहा है, वे जब तक बनी रहेगीं तब तक वे विज्ञान का बड़े पैमाने का विकास या खास तौर पर भारतीय संस्कृति पर विज्ञान का कोई गंभीर असर नहीं होने देंगी। यह अपरिहार्य है कि विज्ञान में भी, और जीवन के अन्य पहलुओं में भी भारतीय लोग राष्ट्रीय दावेदारी की जरूरत महसूस करें लेकिन यह नजरिया हमेशा असहज ही होता है। भारतीय वैज्ञानिक के लिए यह बाध्यकारी है कि सबसे पहले वह अंग्रेजी माध्यमों से ही विज्ञान सीखे और इसके साथ ही अंग्रेजों का अपनी अधीनस्थ जातियों के प्रति जो अभिभावकत्व जताने और उन्हें अपमानित करने की आदतें हैं उन्हें झेले। इस प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया में समर्पण और अक्खड़पन का एक घालमेल पैदा होता है जो वैज्ञानिक कार्य की गुणवत्ता को अनिवार्यतः प्रभावित करता है। भारतीय विज्ञान को अपनी अवधारणाओं और प्रायोगिक प्रक्रियाओं की मौलिकता के लिए जाना जाता है लेकिन इसके साथ ही इसे इसकी अविश्वसनीयता और स्वयं शोधकार्य के दौरान आलोचनात्मक रवैए के अभाव के लिए भी जाना जाता है।

कहना न होगा कि भारत में होने वाले हर काम की तरह (अपवाद केवल अंग्रेज नागरिक सेवा और फ़ौज हैं) भारतीय विज्ञान को भी धन की किल्लत झेलनी पड़ती है। भारत में वैज्ञानिक शोध के लिए उपलब्ध कुल सालाना राशि 250,000 पौंड से ज्यादा नहीं है जो जनसंख्या को देखते हुए प्रति व्यक्ति 1/50 पेनी (penny : एक पाउंड सौवां हिस्सा) पड़ता है। 1,700,000,000 पौंड की दरिद्रतापूर्ण राष्ट्रीय आय का भी यह महज 0.015 प्रतिशत ठहरता है। इसके बावजूद संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसे विज्ञान के अनुप्रयोग की जरूरत भारत से ज्यादा हो। भारतीय लोगों में निहित वैज्ञानिक विकास की महान संभावनाओं को देखते हुए यह जरूरी है कि उन्हें आत्मनिर्भर और स्वतंत्र समुदाय में परिणत किया जाए। भारतीय विज्ञान के सर्वश्रेष्ठ कर्मी आज संभवतः वहां के वैज्ञानिक नहीं, बल्कि वहां के राजनीतिक आन्दोलनकारी हैं, जो इसी लक्ष्य को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।




प्रस्तुत चित्र प्रतीक रूप में विज्ञान और राजनेताओं के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए लगाये गये हैं।


‘आधुनिक भारत का इतिहास’ पुस्तक में इतिहासकार प्रो. विपिन चन्द्र लिखते हैं - अनेक भारतीय इस कदर पस्त हो चुके थे कि वे अपनी स्वशासन की क्षमता में एक दम भरोसा खो बैठे थे। इसके अलावा उस समय के अधिकांश ब्रिटिश अधिकारी और लेखक लगातार यह बात दोहराते रहते थे कि "भारतीय लोग कभी भी अपना शासन चलने के योग्य नहीं थे। वे लगातार भारतीयों की निंदा करने वाली बातें फैलाते रहते थे। मसलन हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते रहे हैं, भारतीयों के भाग्य में ही विदेशियों के अधीन रहना लिखा है, उनका धर्म और सामाजिक जीवन पतित और असभ्य रहे हैं और इस कारण वे लोकतंत्र या स्वशासन तक के काबिल नहीं हैं।" इस प्रचार का जबाब देकर अनेक राष्टवादी नेताओं ने जनता में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जगाने के प्रयत्न किये। वे गर्व से भारत की संस्कृति धरोहर की ओर संकेत करते और आलोचकों का ध्यान अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और अकबर जैसे शासकों की ओर खींचने का प्रयास करते। इन शासकों ने विद्वानों, कला, स्थापत्य, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और राजनीति में भारत की राष्ट्रीय धरोहर की फिर से खोज करने में जो कुछ किया, उससे इन राष्ट्रवादी नेताओं को बल तथा प्रोत्साहन मिला। दुर्भाग्य से कुछ राष्ट्रवादी नेता दूसरे छोर तक चले गए तथा भारत के अतीत की कमजोरियों और पिछड़ेपन से आँखे चुरा कर गैर-आलोचनात्मक ढंग से उसे महिमामंडित करने लगे। खास तौर पर प्राचीन भारत की उपलब्धियों का प्रचार करने तथा मध्यकालीन भारत की उतनी ही महान उपलब्धियों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति ने भी बहुत नुकसान पहुँचाया। इसके कारण हिन्दुओं में सांप्रदायिक भावनाओं के विकास को प्रोत्साहन मिला। साथ ही इसकी जवाबी प्रवृत्ति के रूप में मुसलमान, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रेरणा पाने के लिए, अरबों तथा तुर्कों के इतिहास की और नज़र करने लगे। इसके अलावा पश्चिम के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की चुनौती का जवाब देते समय बहुत से भारतीय यह बात भी भूल जाते थे कि भारत की जनता कई क्षत्रों में सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़ी थी। इससे गर्व तथा आत्मसंतोष की एक झूटी भावना पनपी जो भारतीयों को अपने समाज के आलोचनात्मक अध्ययन से रोकती थी। इसके कारण सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ेपन के खिलाफ़ संघर्ष कमजोर हुआ। तथा अनेक भारतीय दूसरी जातियों की स्वस्थ और नयी प्रवृत्तियों और नये विचारों से विमुख रहे।

स्रोत :
1.   चंद्रभूषण, ‘विज्ञान की सामाजिक भूमिका’ (विज्ञान-इतिहासकार भौतिकविद जॉन डेस्मंड बर्नल की कृति ‘द सोशल फंक्शन ऑफ़ साइंस’ 1939 का हिन्दी अनुवाद), ग्रन्थ शिल्पी प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली - 2002
2.   इतिहासकार प्रो. विपिन चन्द्र, ‘आधुनिक भारत का इतिहास (हिन्दी संस्करण)’, ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली – 2009

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