मेरा विज्ञान लेखन का सफ़र

जब भी मेरी मम्मी यह देखकर खुश होतीं कि आज मेरा बेटा बहुत देर से मन लगाकर पढ़ाई कर रहा है। तो निश्चित रूप से मैं या तो गणित कर रहा होता था या फिर चित्रों के द्वारा विज्ञान की समस्याओं से जूझ रहा होता था, जो कि मेरे पाठ्यक्रम से बाहर का ज्ञान था। जबकि मम्मीजी के अनुसार उस समय में मुझे अपना गृहकार्य करना चाहिए था। संभवतः इसीलिए मैं सदैव चित्रकला और वैदिक गणित प्रतियोगिता में साथियों की तुलना में अव्वल रहा।

विशेषकर कक्षा 9 और 10 की विज्ञान सम्बन्धी समस्याओं को जब मैं अपने शिक्षक (सर) से पूछता था तो उत्तर न दे पाने की स्थिति में वे अक्सर मेरी शिकायत करने लगते थे कि "तुम जानबूझकर मुझे परेशान करते हो, ताकि अन्य साथियों की नज़रों में तुम विशेष बन सको।" चूँकि वे सर मेरे घर के ठीक बाजू में रहते थे तो जब चाहे मेरी शिकायत पापाजी से कर दिया करते थे।

पापाजी के समझाने के बाद से मैंने अपनी समस्याओं को उन सर से पूछना बंद कर दिया परंतु चिट के माध्यम से उन्हें लिख-लिखकर एक स्थान पर एकत्रित करना प्रारम्भ कर दिया था। यही कार्य मैंने कक्षा 11वी. और 12वी. की विज्ञान सम्बन्धी समस्याओं के लिए न के बराबर किया। क्योंकि स्कूल बदल जाने से मेरे शिक्षक भी बदल गए थे।

कक्षा 12वी. की बोर्ड परीक्षा समाप्त हो जाने के ठीक बाद से मैंने उन समस्याओं पर विचार करना और उन पर लिखना प्रारम्भ किया। बेशक, मेरी कच्ची समझ और 12वी. तक पढ़ी जानकारियों के आधार पर समस्याओं का समाधान ढूँढना, कल्पनाओं को उड़ान देने जैसा था। इस बीच मैंने कक्षा 11 वी. में 'कृत्रिम उपग्रहों का कक्षीय जीवन' नामक एक प्रोजक्ट रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसकी विज्ञान शिक्षक महेश कुमार गौतम सर ने प्रशंसा की थी इसलिए स्वाभाविक रूप से मैंने अपने लिखित समाधानों को सर्वप्रथम गौतम सर को ही दिखाया। उसके बाद मैं निरंतर एक शिक्षक के द्वारा दूसरे विज्ञान और गणित के शिक्षकों के संपर्क में जाता गया। इस तरह से शिक्षकों द्वारा दी गई जानकारियाँ मेरे पास बढ़ती गईं और विषय के बारे में थोड़ी-थोड़ी समझ आते गई। परंतु कक्षा 9 और 10 के कुछ प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं और कुछ के उत्तर पिछले महीने ही मार्च 2019 को रसायन की एक पुस्तक में 15 वर्ष बाद पढ़ने को मिले।

मैंने अपनी पहली ओरल तथा पोस्टर प्रस्तुति भारतीय विज्ञान सम्मेलन भोपाल, दिसम्बर सन 2007 में 'शून्य से अनंत तक' के विषय पर दी थी। मेरी पहली प्रस्तुति की प्रशंसा हुई तो उसके बाद मैं अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव फ़रवरी 2008, भारतीय विज्ञान सम्मेलन 2009, अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव फ़रवरी 2010, इंटरनेशनल सर्च एंड रिसर्च 2010 ओरल प्रेजेंटेशन सहित 6 सम्मेलनों में प्रतिभागी बना।

वर्ष 2010 के अंतिम महीनों में मेरे मन में ब्रह्मांड के बारे में एक पुस्तक लिखने का विचार आया। जिसका नाम जनवरी 2011 में आधारभूत ब्रह्मांड रखा गया। पुस्तक लेखन के साथ-साथ सोशल साइट्स पर भी लेखन करता रहा। उस समय मेरे ब्लॉग पर सिर्फ 16 पोस्ट्स थीं तभी 2013 में मेरे ब्लॉग का चयन 'द बोबस अवार्ड' (अंतर्राष्ट्रीय) में 2 श्रेणियों के लिए हुआ। उसी वर्ष इंडियन ब्लॉगर अवार्ड भौतिक विज्ञान - 2013 विजेता घोषित हुआ। स्वाभाविक है कि मुझे लेखन कार्य में पुरस्कार प्राप्त होने से प्रोत्साहन के साथ नयी ऊर्जा मिल गई थी। 2015 तक मैंने आधारभूत ब्रह्मांड नामक पुस्तक के 96 पेज लिख लिये थे।

एक दिन मेरे किसी मित्र ने टैग करते हुए, फेसबुक पर मेरे ब्लॉग का परिचय देते हुए एक पोस्ट लिखी कि 'विज्ञान के इस ब्लॉग को पढ़ा जाना चाहिए।' जिस पर बच्चों के डॉ. अशोक गुप्ता जी ने अपनी सामान्य प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि यह तो 'दर्शन' का ब्लॉग मालूम होता है। उनकी इस प्रतिक्रिया पर मेरी प्रतिक्रिया थी कि कृपया, आप एक बार और ध्यान से पढ़ने का कष्ट करें श्रीमान। उसके बाद अभी तक गुप्ता जी का कोई उत्तर नहीं आया है।

सन 2015 के बाद से मैंने आधारभूत ब्रह्मांड पुस्तक और ब्लॉग दोनों पर लिखना बंद कर दिया। क्योंकि तब मुझे अपना लेखन व्यर्थ लग रहा था और मेरा विचार था कि जो समाज विज्ञान और दर्शन के भेद को नहीं जानता है। वह विज्ञान को अन्य शास्त्रों या विषयों से कैसे भेद कर पाता होगा? शंका रूप में मेरा प्रश्न था कि क्या वाकई में समाज के लोग विज्ञान को अन्य विषयों से पृथक कर समझने में सक्षम हैं? आगमन और निगमन विधि जो गणित, विज्ञान और दर्शन तीनों में प्रयुक्त होती है क्या इन शास्त्रों में इन विधियों के भिन्न-भिन्न प्रभावों और तरीकों के विषय के बारे में आम लोग जानते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए या यों कहूँ कि आधारभूत ब्रह्मांड पुस्तक की समझ के लिए मजबूत आधार बनाते हुए मैंने एक पुस्तक लिखी है। जिसका नाम पहले 'वैज्ञानिक दृष्टि में वैश्विक समाज' रखा था। इसी नाम से मैंने पुस्तक का कॉपीराइट भी कराया है।


इस पुस्तक को लिखने में मुझे 14 माह तथा ड्राफ्ट तैयार करने में 8 माह का समय लगा है। साथ ही विषय सम्बन्धी 82 पुस्तकों तथा लगभग 650 लेखों को पढ़कर यह पुस्तक लिखी गई है। जिस में विज्ञान के सहजबोध, इतिहास, विकास, दर्शन, द्वंद, वैज्ञानिक खोजें, अन्य विषयों से उसका सम्बन्ध, उसकी विधियाँ, पद्धति, कार्यशैली के आदर्श (शास्त्रीय) और मानक तरीके, सामाजिकता तथा इन सब पर वैज्ञानिकों-दार्शनिकों के उद्धरणों का लेखन किया गया है। सामाजिक मुद्दों के बारे में यह पुस्तक केवल उतना ही कहती है जितना कि एक वैज्ञानिक सामाजिक मुद्दों पर विज्ञान से होने वाले लाभ या हानि से उसका दायरा निर्धारित करता है। लेखक होने के नाते पुस्तक में मेरा योगदान केवल विज्ञान पर अविश्वास जताने संबंधी आम लोगों के प्रश्नों, उत्तर रूप में सम्बंधित वैज्ञानिक मतों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के उद्धरणों, समस्याओं, वैकल्पिक समाधानों, घटनाओं, अभिधारणाओं (Postulates) तथा विज्ञान-दर्शन को पुस्तक में सही स्थान पर लिखने का रहा है, परंतु इसके साथ ही मैंने स्पष्टता लाने के लिए वैज्ञानिक मतों, कार्यशैली और पद्धति के स्वरूप में आवश्यकतानुसार विस्तार और वर्गीकरण किया है; ताकि समाज में विज्ञान का मजबूत पक्ष और उसकी भूमिका की स्पष्ट छवि सबके सामने आ सके तथा विज्ञान सही अर्थ के साथ प्रभावी हो सके।

पुस्तक में एडिटिंग, प्रूफ रीडिंग के दौरान विषय के विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि 'वैज्ञानिकों-गणितज्ञों-दार्शनिकों के अलावा विषय के बारे में मैं अपने मत भी प्रस्तुत करूँ या पुस्तक का उपसंहार लिखूं। क्योंकि मैंने पूरी पुस्तक में कहीं भी निष्कर्ष रूप में उपसंहार या अपने मत नहीं रखे हैं। केवल विज्ञान के सभी दर्शनों के मतों को पुस्तक में बराबर स्थान और महत्त्व दिया है और निर्णय पाठकों पर छोड़ दिया है। अंततः मुझे विशेषज्ञों और प्रोफेसर सर का सुझाव सही लगा तो मैंने एक नये अध्याय को नये तरीके से पुस्तक के निष्कर्ष रूप में लिखा है। फलस्वरूप मैंने पुस्तक का नाम भी परिवर्तित कर दिया, जिसका शीर्षक अब 'आग से अंतरिक्ष तक' है।

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