विज्ञान, अप्रत्याशित खोज है परंतु अलौकिक ज्ञान नहीं है।

हम पृथ्वी के गोल होने या जैव-उद्विकास के सिद्धांत को अपने अनुभव या प्रत्यक्ष दर्शन से कभी भी नहीं समझ सकते हैं। ऐसे ही अनापेक्षित निष्कर्ष या तकनीकें जो हमारे सामने विज्ञान प्रस्तुत करता है; ऐसी मालूम होती हैं जैसे कि कोई विलक्षणता या चमत्कार हो, परंतु वास्तविकता यह है कि विज्ञान इसी दुनिया के बारे में दावे प्रस्तुत करता है और विलक्षणता या चमत्कार जैसी चीजों को नकारता है। निश्चित रूप से आविष्कार तथा कला के संयोग से निर्मित हाथ की सफाई जिसे हम जादू कहते हैं, को देखकर हम आश्चर्यचकित होते हैं, परंतु एक सामान्य व्यक्ति भी इनका ज्ञान प्राप्त कर इन्हें दोहरा सकता है, इसलिए हम कहते हैं कि विलक्षणता या चमत्कार जैसी कोई चीज नहीं होती है।

चूँकि पृथ्वी की विशालता के अनुपात में उसकी वक्रता इतनी कम है कि हमें पृथ्वी के गोल होने का आभास ही नहीं हो पाता है, इसलिए प्रत्यक्ष दर्शन द्वारा पृथ्वी की वास्तविकता जानने के लिए हमें ऊँचाई अर्थात व्यापक दृष्टिकोण तथा विकासवाद को समझने के लिए, एक लम्बी समयावधि में एकत्रित व्यापक आँकड़ों की आवश्यकता होती है, अन्यथा हर वैज्ञानिक खोज हमें अलौकिक ज्ञान प्रतीत होगी। विज्ञान भले ही नए-नए अप्रत्याशित, असामान्य और अज्ञात निष्कर्षों की खोज तथा आविष्कारों के माध्यम से हमें अचंभित करता है परंतु वह यह स्थापित नहीं करता है कि विज्ञान या वैज्ञानिक व्यक्ति अलौकिक या चमत्कारी होते हैं; बल्कि वह तो वैज्ञानिक विधियों के दोहराव से इस दावे का खंडन करता है कि विलक्षणता या चमत्कार जैसी कोई चीज नहीं होती है।


इस दुनिया में मनुष्य द्वारा चमत्कार को नमस्कार करने का अर्थ ही है कि जो कुछ भी हमें दिखाई, सुनाई या जिसका हमें आभास हो रहा है। हम उस ज्ञान से अभी तक अनभिज्ञ हैं। निश्चित रूप से हमारी यह अज्ञानता हाथ की सफाई, उपकरणों द्वारा मनुष्यों का छलावा, इन्द्रियों की सीमाओं से निर्मित भ्रम, रासायनिक अभिक्रियाओं के प्रदर्शन या अभ्यास द्वारा विकसित जैविक क्षमताओं में से किसी एक के बारे में होती है।

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