विज्ञान, विधियुक्त ज्ञान है केवल ज्ञान या विधि नहीं है।

यदि विज्ञान में प्रयोग (Experiment) या प्रमाण (Proof) की प्रमुखता के आधार पर सत्य को स्वीकार किया जाता, तो इतिहास और अर्थशास्त्र विषय रूप में विज्ञान की एक शाखा होते। क्योंकि अर्थ-व्यवस्थाओं में ढाँचा के प्रकार को समझते हुए तात्कालिक आँकड़ों के आधार पर विज्ञान के समान ही सफलतापूर्वक प्रायोगिक निर्णय लिए जाते हैं तथा इतिहास में भी खोजें होती हैं जो साक्ष्य-प्रमाण के आधार पर स्वीकार्य की जाती हैं। हाँ, यह सत्य है कि विज्ञान में सिद्धांतों की विश्वसनीयता प्रयोग और प्रमाण से न केवल निर्मित होती है बल्कि स्वाभाविक रूप से बढ़ती भी है। इनके अभाव में सत्य सदैव संदेहास्पद होता है, परंतु प्रयोग और प्रमाण, विज्ञान की वह प्रमुख विशेषता नहीं है जिसके द्वारा विज्ञान की पहचान होती है।

वैज्ञानिक सत्य के लिए आवश्यक है उस ज्ञान का विधियुक्त होना। ― दार्शनिक अल्फ्रेड नार्थ व्हाइटहेड (Alfred North Whitehead)

अर्थात जिस किसी ज्ञान को उस तक पहुँचने की प्रक्रिया (Process) या विधि (Method) के साथ जोड़कर बताया जाता है, तो ऐसा ज्ञान, विज्ञान कहलाता है। क्योंकि उस प्रक्रिया या विधि के दोहराव में प्रमाण के गुण मौजूद होते हैं। ज्ञान का विधियुक्त होना प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण का एक विशेष तरीका है, जो इतिहास के प्रमाणों (Evidences) से भिन्न होता है; अर्थशास्त्र की भविष्यवाणियों (Predictions) और उनकी सफलताओं से भिन्न होता है। विधियुक्त ज्ञान न केवल पूर्ण होता है बल्कि वह हमें सत्य के सशर्त होने का बोध भी कराता है।

विधियुक्त ज्ञान को ही विज्ञान कहते हैं; यदि कोई ज्ञान बिना विधि के किसी भी तरीके से प्राप्त हो रहा हो फिर चाहे वह सत्य ही क्यों न हो, परंतु ऐसे ज्ञान को विज्ञान नहीं कह सकते हैं, क्योंकि ऐसे ज्ञान पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जा सकता है या फिर ऐसी कोई विधि जो भौतिक उत्पाद उत्पन्न करे; परंतु ज्ञान का सृजन न करे, तो वह वैज्ञानिक विधि नहीं कहलाती है। इस तरह हम विज्ञान को पूर्ण सत्य कहते हैं, जो अधूरी जानकारी के कारण अधूरा नहीं होता बल्कि तब उसका अस्तित्व ही नहीं रहता है। पूर्ण सत्य का अर्थ ही विधि के साथ उससे निर्मित ज्ञान का संयोजन है। वैज्ञानिक सत्य की पूर्णता की महत्ता को एडवर्ड टेलर ने अपने शब्दों में इस तरह पिरोया है कि “तथ्य, एक सरल वक्तव्य है कि उस पर हर कोई विश्वास करता है। वह बेक़सूर है जब तक कि कोई कसूरवार नहीं मिल जाता। परिकल्पना, एक उपन्यास सुझाव है कि कोई भी विश्वास नहीं करना चाहता है। वह कसूरवार है जब तक कि वह प्रभावी नहीं पायी जाती।”


इतिहास ज्ञान तो है, परंतु विज्ञान नहीं है, क्योंकि उसमें पद्धति का अभाव है। जबकि पुरातत्व, इतिहास और विज्ञान के मध्य का विषय है, अर्थात वह प्रत्यक्ष (भौतिक) प्रमाणित ज्ञान तो है परंतु वह ज्ञान पद्धति के अभाव में विधियों द्वारा प्राप्त होता है, इसलिए हम पुरातत्व को विज्ञान की शाखा नहीं मानते हैं। हम यह कह सकते हैं कि पुरातत्व को विज्ञान कहना उतना गलत नहीं है जितना कि इतिहास को विज्ञान मानना, क्योंकि इतिहास एक व्यक्तिपरक विषय है जबकि विज्ञान एक वस्तुनिष्ठ ज्ञान है। इसीलिए रसायनज्ञ जेम्स बी. कोनेन्ट के अनुसार ‘विज्ञान, कुल संचित ज्ञान का केवल एक भाग है।’ इसलिए इतिहास, विज्ञान की शाखा नहीं हो सकता है।

हालाँकि इतिहास को विज्ञान सिद्ध करने के लिए बहुत-से प्रयास किये गए हैं, क्योंकि इतिहास के अंतर्गत भी हम खोज करते हैं, परंतु केवल ज्ञान या विधि अधूरा सत्य है, जहाँ ज्ञान के द्वारा विज्ञान की स्थिर प्रकृति का बोध होता है वहीं विधि के द्वारा विज्ञान की गतिशील प्रकृति का बोध होता है, परंतु विज्ञान में ये दोनों प्राकृतिक वृत्तियाँ सम्मिलित रूप से पायी जाती हैं। फलस्वरूप विज्ञान की प्रकृति संशोधित सत्य को सतत संचित करने की होती है, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि भले ही निष्पक्ष नहीं रहा जा सकता है, परंतु वैज्ञानिक विधियों के सहयोग से निष्पक्ष रहा जा सकता है, क्योंकि विधियों का दोहराव संभव है। और इसलिए निष्पक्षता वैज्ञानिकों के लिए एक बाध्यता है। यदि वैज्ञानिक गण निष्कर्षों के प्रति निष्पक्ष नहीं होंगे; तो वैज्ञानिक विधियों के दोहराव से एक समान परिणाम प्राप्त न होने की स्थिति में या पूर्वानुमानों के गलत होने पर उनका यह पक्षपात उजागर हो जाएगा। प्रायोगिक भ्रम द्वारा ‘एन’ किरणों की खोज का दावा, रॉबर्ट गलिस के कैंसर कोशिकाओं पर नशीली दवाओं के प्रभाव के काल्पनिक परिणाम, प्रोफेसर जॉन लॉन्ग द्वारा एक प्रतिरक्षा अणु का अणुभार बंदर की कोशिका को मनुष्य की कोशिका बताकर प्रस्तुत किये गए मनगढ़ंत आँकड़े, सर सिरिल बर्ट द्वारा बुद्धि के आनुवंशिक आधारित होने के पक्ष में प्रस्तुत किये गए पूर्वाग्रह से ग्रसित आँकड़े और मुख्य रूप से मनो-विज्ञान, अर्थशास्त्र सहित अन्य सामाजिक विज्ञान से संबंधित परिणाम और उनके निष्कर्ष आदि उदाहरण पक्षपात के तौर पर गिनाये जा सकते हैं।

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