सौ वर्ष बाद भी...

सेतु पत्रिका के मई अंक में प्रकाशित लेख

ग्रहण और उसकी अवधि सदैव से आमजन के लिए कौतूहल तथा खगोलविदों के लिए शोध का विषय रही है। जहाँ आमजन ने एक तरफ ग्रहणों के सम्बन्ध में बहुत-सी मान्यताएँ गढ़ीं हैं, जो परम्पराओं में शुभ-अशुभ का संकेत बनीं, जिसका उपयोग समय-समय पर तख्ता पलटने में किया गया। तो वहीं दूसरी तरफ खगोलविदों ने इन खगोलीय घटनाओं के कठिन प्रेक्षणों और उनके होने के समय संबंधी आँकड़ों के लम्बे अध्ययनों में प्रतिमानों को उभरते पाया, जिसके आधार पर वे इनका पूर्व अनुमान लगा सकने सक्षम हुए तथा जिनका उपयोग उन्होंने युद्ध टालने और सौर-मंडल को समझने में किया। इस तरह से ग्रहण सम्बन्धी मिथकों और यथार्थ ने सदैव से निर्णायक भूमिका निभाई है।

ऐसा ही एक निर्णायक मोड़ सौ वर्ष पहले 29 मई 1919 को पूर्ण सूर्य-ग्रहण के दौरान आया था। जब प्रकृति ने अपना निर्णय अल्बर्ट आइंस्टाइन के पक्ष में सुनाया, और हमारी सोच को पूरी तरह से बदल दिया। विज्ञान की अपनी विशेषता है कि हम जिसे सत्य मानकर चलते हैं ज्ञान वृद्धि और नई समस्याओं के सामने आने से समयानुरूप उसमें संशोधन, विस्तार या एकीकरण करना पड़ता है। इसी का परिणाम था कि भौतिकशास्त्री अल्बर्ट आइंस्टाइन द्वारा प्रतिपादित साधारण सापेक्षता सिद्धांत ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को विस्थापित कर दिक्, काल और गुरुत्वाकर्षण के बारे में हमारे विचारों को सदैव के लिए बदल दिया है।

साधारण सापेक्षता सिद्धांत ने विश्व की संरचना से सम्बंधित हमारे विचारों को एक कदम आगे बढ़ा दिया है; मानों सत्य को हमसे पृथक रखने वाली दीवार ढह गई है। ― सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री हेरमान वाइल (Hermann Weyl) 1918 ई.

साधारण सापेक्षता का सिद्धांत इस लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि अभी तक उसे किसी और सिद्धांत ने विस्थापित नहीं किया है, वह सौ वर्षों से अब भी टिका हुआ है। बल्कि वह इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि परिकल्पना की प्रायोगिक पुष्टि होने के बाद भी सिद्धांत आधारित शेष प्रस्तुत पूर्वानुमान अब भी सही पाए जा रहे हैं।

अल्बर्ट आइंस्टाइन ने 1905 ई. में विशिष्ट सापेक्षता सिद्धांत प्रस्तुत करने के बाद से ही साधारण सापेक्षता सिद्धांत पर कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था, जो 1915 ई. में जाकर समाप्त हुआ। तब इस परिकल्पना को प्रेक्षण, प्रयोग या परीक्षण द्वारा पुष्टि की आवश्यकता थी। क्योंकि अल्बर्ट आइंस्टाइन का उक्त कार्य केवल एक वैचारिक प्रयोग था, जो कि कुछ अभिधारणाओं (postulates) पर टिका था। इसका अर्थ हुआ कि व्यवहार में प्रयोग के निष्कर्ष अल्बर्ट आइंस्टाइन की परिकल्पना के सत्य या असत्य में से एक होने की पुष्टि करते। क्योंकि एक वैज्ञानिक सिद्धांत न केवल अब तक के ज्ञात तथ्यों और घटनाओं की अपनी तरह से व्याख्या करता है बल्कि परखी जा सकने वाली परिकल्पनाएँ भी प्रस्तुत करता है। इसलिए भविष्य में उस परिकल्पना की पुष्टि हो जाने से न केवल वह सिद्धांत सिद्ध हो जाता है बल्कि उस पर आधारित व्याख्याएँ भी सत्य कहलाती हैं।

सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की पुष्टि पर साप्ताहिक पत्रिका 'The Illustrated London News' में प्रकाशित 22 नवम्बर 1919 का लेख

सन 1916 ई. में इस सिद्धांत के प्रकाशित होने के बाद यह पूर्व अनुमान सामने आया कि गुरुत्वीय क्षेत्र में से गुजरने वाली प्रकाश किरणें प्रयुक्त बल की दिशा में मुड़ जानी चाहिए। इस दावे को परखने का सबसे अच्छा अवसर पूर्ण सूर्य-ग्रहण होता है क्योंकि आंशिक सूर्य-ग्रहण के दौरन सूर्य की चमक तारों के प्रेक्षण में बाधा उत्पन्न करती है। खगोलशास्त्री फ्रैंक डायसन (Frank Watson Dyson) और सर आर्थर एडिंगटन (Sir Arthur Stanley Eddington) ने रॉयल सोसायटी के अनुरोध पर अल्बर्ट आइंस्टाइन की परिकल्पना को परखने का जिम्मा उठाया और वे दो दलों में विभक्त हो गये। एक दल डायसन के नेतृत्व में उत्तरी ब्राजील के सोब्राल गांव तथा दूसरा दल एडिंगटन के नेतृत्व में पश्चिमी अफ्रीका के प्रिंसिप द्वीप पहुँचा। जहाँ पर उन्होंने परीक्षण के दौरान पाया कि सूर्य के पीछे स्थिर तारा अपने वास्तविक स्थान से भिन्न स्थिति दर्शा रहा है। इसका अर्थ है कि उस तारे से हमारे पास तक आने वाला प्रकाश सूर्य के गुरुत्व प्रभाव में विचलित हो गया है, प्रयुक्त बल की दिशा में मुड़ गया है। इस तरह परिकल्पना की पुष्टि होने से वह सिद्धांत के रूप में स्वीकार्य हो गई।

साधारण सापेक्षता-सिद्धांत आज भी इसलिए मान्य और महत्त्वपूर्ण है क्योंकि न केवल सौ वर्ष पूर्व सूर्य-ग्रहण के दौरान उसकी पुष्टि हुई थी बल्कि उसने बुध ग्रह की कक्षा सम्बन्धी समस्या की भी अपनी तरह से व्याख्या प्रस्तुत की थी। साथ ही यह सिद्धांत विशिष्ट सापेक्षता-सिद्धांत की धारणाओं के संगत है और ब्रह्मांड के स्वरूप के बारे में गुरुत्वीय तरंगों और ब्लैक होल जैसी जटिल संरचनाओं का पूर्व अनुमान प्रस्तुत करता है, जिनकी पुष्टि वैज्ञानिक समुदाय सौ वर्ष बाद भी कर रहा है।

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