डॉ. स्कन्द शुक्ल भैया का संस्मरणात्मक लेख

डॉ. स्कन्द शुक्ल भैया ने मेरी आगामी पुस्तक के बारे में एक संस्मरणात्मक लेख लिखा है।

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अज़ीज़ कुमार राय को पढ़ते हुए फ़िल्म 'मिशन मंगल' देखना और गैलीलियो गैलीली की वंशबेल को जानकर मुदित होना , पिछले सप्ताह के तीन महत्त्वपूर्ण अनुभव रहे।

विज्ञान की शिक्षा-पद्धति में अनिवार्यता मानी भले जाती हो , लेकिन बहुधा वह सामान्य ज्ञान से अधिक ऊँचा दर्ज़ा नहीं पाता। वैज्ञानिक तथ्य अधिकांश लोगों के लिए मात्र जानकारी-भर होते हैं , उसी तरह जिस तरह विश्वयुद्धों की घटनाएँ और राजाओं-महाराजाओं की ताजपोशियाँ एवं हत्याएँ हुआ करती हैं। वैज्ञानिक पर भी इतने अधिक अधिनायकत्व लाद दिया जाता है कि लोग उनसे सीखते कम हैं क्योंकि वे अभिभूत होने से आगे ही नहीं बढ़ पाते। विज्ञानप्रेमी विद्यार्थियों के लिए देशभर में श्रद्धा के ऐसे अनगिनत बुलबुले रच दिये जाते हैं कि उनके भीतर से वे विज्ञान-कर्म और विज्ञान-जीवी दोनों को किसी रूमानी दृश्य की तरह निहारते हैं। बस ! यही वैज्ञानिक शिक्षा की अन्तिम परिणति है। कम्प्टीशन पीटो पहले और फिर पैसा --- जय हो गयी विज्ञान की !

विज्ञान की उपलब्धियाँ और वैज्ञानिकों की जीवनियाँ विज्ञान-शिक्षा में मुख्य नहीं गौण रूप में प्रस्तुत करनी चाहिए , ऐसा मेरा मानना है। बच्चों को बल्कि इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिए कि विज्ञान की नज़र क्या होती है और कैसे इसे विकसित किया जाता है। वैज्ञानिक निष्कर्ष और गणितीय निष्कर्ष में भेद क्या है और किस तरह से दोनों का सामंजस्य ज़रूरी है। क्यों हमें अपने जीवन में जॉन लॉक और रेने देकार्ते दोनों के समन्वित दर्शनों की आवश्यकता है। क्यों हम केवल इन्द्रिय-ज्ञान से अथवा केवल तर्कशीलता से संसार के रहस्य नहीं हल कर सकते और क्यों हमें दोनों का सामंजस्य विज्ञान-विकास के लिए चाहिए होता है।

बच्चों को यह भी सिखाना ज़रूरी है कि विज्ञानी दृष्टि को विकसित करने का अर्थ कलात्मक रूप से अन्धे होना नहीं। वैज्ञानिक उद्देश्यहीनता-भावशून्यता के साथ नहीं जीते , यद्यपि केवल पुनीत उद्देश्यों और भावप्रवण होने-भर से विज्ञान में कुछ सिद्ध नहीं होता। नीयत-मेहनत-क़िस्मत तीनों के साथ होने से वैज्ञानिक उपलब्धि विरलों के ही हाथ लगती है : इसलिए विज्ञानजीविकोपार्जक बनने जा रहे बच्चों को यह बताना ज़रूरी है कि यहाँ सफलता और महत्त्वाकांक्षा की शर्तों के साथ प्रवेश करना सबसे बड़ी ग़लती साबित होती है।

गैलीलियो गैलीली को आधुनिक विज्ञान का पिता माना जाता है , लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि उनके पिता विंसेंजो गैलीली महान् संगीत-विशारद गणितज्ञ थे। उनकी प्रेरणा से ही उनके पुत्र गैलीलियो को प्रयोगात्मक होने में मदद मिली : केवल गणित के सहारे नहीं , इन्द्रिय-ज्ञान के सहारे विज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ना ही उन्होंने उचित समझा। यही नहीं उनके एक भाई मायकेलैग्नोलो गैलीली अपने पिता की ही तरह विशद संगीतकार बने।


बीते दिनों आयी फ़िल्म 'मिशन मंगल' देखकर अन्तरिक्ष-शोधी रूमानी वैज्ञानिक बनना एक बात है , लेकिन विज्ञान की राह केवल रूमानी बनने से पार नहीं होती। यह अज्ञान के अन्धकार का वह जंगल है , जहाँ काँटे बहुत हैं। लेकिन फिर भी विज्ञान के पक्ष में गीत-कहानी-फ़िल्म कुछ भी कहकर-प्रस्तुत कर के हम नये और बेहतर अन्तरिक्षीय नायक चुनना सीख रहे हैं , इतना ही सन्तोषप्रद कहा जा सकता है। अपनी तमाम विसंगतियों और विरोधाभासों के साथ 'मिशन मंगल' जागरूकता का एक प्रयास मानी जा सकती है , लेकिन वैज्ञानिक चेतना का जन-प्रसार जागरूकता से बहुत आगे की बात है जिसके लिए मंगल की कक्षा में उपग्रह-स्थापना के साथ-साथ स्कूलों-कॉलेजों की कक्षाओं में वैज्ञानिक सोच भी स्थापित करनी होगी।

अज़ीज़ कुमार राय की गम्भीर पुस्तक 'वैज्ञानिक दृष्टि में वैश्विक समाज (वर्तमान नाम - आग से अंतरिक्ष तक) ' स्कूलों-कॉलेजों में विज्ञान-अध्यापकों, प्रसारकों , छात्रों एवं जनसामान्य में समान रूप से बार-बार पढ़ी जानी जानी चाहिए। पाठ्यपुस्तकीय विज्ञान के साथ-साथ यह भी जानना ज़रूरी है कि कैसे हमें विज्ञान को महज़ जानकारी और वैज्ञानिक को मात्र अधिनायक बनने से रोकना है।

विज्ञान को महज़ जानकारी मानना और वैज्ञानिक को मात्र रूमानी हीरो समझना वैज्ञानिक चेतना-कृषि के लिए नाशक टिड्डियों की वह गुंजार करती जोड़ी है , जो सब चट कर जाएगी और समाज भूखा ही रह जाएगा।

अज़ीज़ को उनकी अनुपम पठनीय-संग्रहणीय कृति के लिए कोटिशः साधुवाद !

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